दुख अथवा शोक के दो सेतु ..... !

दुख अथवा शोक  दो ही हेतु होते हैं- प्रिय वियोग एवं आप्रियसंयोग अथवा ईस्ट का विनाश एवं अनिष्ट की प्राप्ति ।इन्ही दो बातो को लेकर सारा संंसार दुखी हो रहा है ।  हिंदू शेरों से मनुष्य को दुख सुख चिंता भय अथवा व्याकुलता होती है इन्हीं दो बातों को लेकर सारा संसार दुखी हो रहा है ।ऐसा कहा जाए तो भी अतिश्योक्ति ना होगी।  कोई कोई तो इस  कारण इतने अधिक दुखी हो जाते हैं कि उन्हें सारा संसार अंधकार में दिखने लगता है
। उन्हें चारों ओर से निराशा के बादल घेर लेते हैं। शोक के मारे दिन रात उनकी छाती जला करती है, दिन में चैन नहीं पड़ता और रात को नींद नहीं आती, शरीर सूखकर कांटा हो जाता है, खाना पीना हराम हो जाता है - यहां तक कि कुछ लोगों को तो जीवन भारी हो जाता है और वह भी घुलकर शरीर छोड़ देते हैं कुछ लोग तो और भी आगे बढ़ जाते हैं । वह मूर्खता है विष आदि का प्रयोग करके, जल में डूब कर फांसी लगाकर अथवा आग में जलकर प्राण त्याग देते हैं।:
लोग स्त्री, पुत्र, धन, मान 'कीर्ती थी अथवा स्वास्थ्य आदि इष्ट पदार्थों के नाश हो जाने अथवा किसी मुकदमे में  फंस जाने के, किसीभयानक रोग के शिकार को जाने अथवा किसी प्राण संकट के उपस्थित हो जाने पर ही ऐसा करते हैं । ऐसे पुरुषों के चित्त शांत करने का क्या उपाय है  ? यही सोच विचार आगे का सुनाया जाता है-
     वास्तव में बात यह है कि ज्ञान, भक्ति और अथवा विवेक विचार किसी भी दृष्टि से शो करना अज्ञान के सिवा और कुछ नहीं है आते हुए मनुष्यों को ना तो ध्यान मकान जमीन जायजाद आदि जगहों के लिए और ना ही स्त्री पुरुष आधी चेतन प्राणियों के लिए शोक करना है चाहिए। जिनका विनाश हो चुका है उनके लिए तो शोक करना बिल्कुल ही बेकार है, बल्कि जिनका विनाश होने वाला है उसके लिए भी बुद्धिमान मनुष्य को शोक नहीं करना चाहिए ।
   श्री कृष्ण भगवान ने गीता के आरंभ में अर्जुन को शोक की नदी के लिए ज्ञान की दृष्टि से यह उपदेश  दिया है भगवान कहते हैं - हे अर्जुन तू ना शोक करने जोकर मनुष्यों के लिए शोक करता है और पंडितों के से बचन को कहता है । परंतु जिनक एप्स लॉक का तात्पर्य है कि किसी के लिए किसी प्रकार किंचित मात्र भी शौक कदापि ना करना चाहिए । प्राण चले गए हैं उनके लिए और जिनके प्राण अभी नहीं गए हैं अर्थात जो मरने वाले हैं उनके लिए भी पंडित जन शौक नहीं करते ।
 उपाय -
1* हमें अपने मन के प्रतिकूल जिस दुखदायक  पदार्थों की प्राप्ति होती है वह हमारे ही किसी पूर्वकृत जन्म अपराध का फल है क्योंकि भगवान के राज्य में पैदा अपराध किसी को दर्द नहीं मिलता । इस प्रकार हमें हमारे अपराधों का दंड देकर भगवान हमें पाप मुक्त करते हैं शुद्ध बनाते हैं
2* इस प्रकार की शिक्षा देकर भगवान हमें भविष्य में पाप करने से रोकते हैं
3* इस प्रकार कष्ट देकर भगवान हमारे आत्मा को बलिष्ट बनाते हैं आग में तप आने जैसा सोना निखर होता है उसी प्रकार कष्ट सहने से आत्मा शुद्ध और बलिष्ठ होती है क्या सब का अनुभव है ।
4* कभी-कभी हम लोग अपनी भक्ति का झूठा अभिमान करने लगते हैं और वास्तव में भगवान ने जैसा विश्वास होना चाहिए वैसा ना होने पर भी अपने को विश्वासी मान बैठते हैं । इसलिए इस प्रकार के कष्ट देकर भगवान हमारी परीक्षा लेते हैं और हमें अपनी असली स्थिति का परिचय कराते हैं तथा हमारा अभिमान भंग करते हैं ।
5* हमारे अपराधों का दंड देकर भगवान अपने न्याय मिलता है सिद्ध करते हैं और हमें चेतावनी देते हैं कि मेरे भजन के सारे पाप में कभी प्रवर्तना होना नहीं तो इस प्रकार का दंड फिर तैयार है  । मैं भजन के बल पर पाप करने वालों की रू-रिरियायत  नहीं करता ।
6* अंतिम और सबसे बड़ा लाभ यह है कि कष्ट में हमें भगवान याद आते हैं । हम लोग संसार के चुस्त नाशवान लोगों के पीछे भगवान को भूले रहते हैं ,इसलिए बीच-बीच में कष्ट देकर भगवान हमें चेतावनी देते रहते हैं कि मुझे भूलो मत नहीं तो बड़ी दुर्दशा होगी । यह मनुष्य शरीर को गंवाने के लिए नहीं मिला है मुझे प्राप्त करने के लिए ही मिला है इसलिए इसे व्यर्थ कामों में ना गँवाओ । 
     इससे अतिरिक्त हमारे मन को प्रतिकूल लगने वाली भगवान की क्रियाओं में हमारा कितना हित भरा रहता है हम लोग समझ नहीं सकते ।अतः प्रभु के लिए जो कुछ करते हैं उसमें उनकी अपार दया एवं अपना परम हित मानकर हमें खूब प्रसन्न रहना चाहिए ।
गुरुजीसत्यवादी श्रीरामधुन 
माँ आदिशक्ति दरबार धार्मिक एवं
परमार्थ टूस्ट भोपाल म०प्र०
           श्रीरामधुन दरबार

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