बदलाव मे स्त्रीप्रधान देश बनेगा भारत "श्रीरामधुन"

बदलाव मे स्त्रीप्रधान बनेगा भारत
"   "यह एक सोचनीय एवं विचारणीय ?"
            बदलाव के इस युग मे देश कहां से जा रहा है यह समझना हर किसी की बात नही है । इससे भी ज्यादा जरूरी है कि देश कोन चला रहा है ? जिसने सारी दुनिया  मे अफरातफरी का वातावरण बनाया है । क्या यह कोरोना संक्रमण बिमारी के कारण है अथवा कुछ लोगो की मिलीभगत के कारण ऐसा हुआ है ?
    आज इस बदलाव मे भारत स्त्रीयो को बड़ा महत्व दिया जा रहा
है वह समझना होगा ? वैसे बदलाव
प्रकृति का नियम है । अब हम इसे स्वीकार केसे करेगें यह भी हमी को तय करना है । कुछ लोग इसे अपना भाग्य का खेल समझकर खेल रहे है तो कुछ सरकार और राजनीति का खेल मानकर चल रहे
है । इन दोनो के बीच का जो रास्ता
है उसे मानकर रहे है । इसी का नाम
मैनेजमेंट है ।
    हमारा जमाना चुपके चुपके लेकिन खूबसूरती से बदल रहा है आजकल किसी भी मध्यम वर्ग के पिता से मिथिए तो वह कहते हैं की बीवी तो मान गई है अब बेटी को मानना है बेटियां आप पापा को हर छोटी बड़ी चीजों में डिक्टेट कर रही है पापा से डिमांड कर रही है देश में जाने कितने समाज में लड़कों से ज्यादा लड़कियां पढ़ लिख रही है जिंदगी सामान्य सुख में चल रही है उन्हें भी एक चिंता यह है की लड़कियां अगर ज्यादा पढ़ लिखते हैं तो वह शादी के लिए सही लड़के मिलने से मुश्किलें आएंगी शायद यह बदलाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समझ लिय दिया यह भाजपा और विपक्ष में बढ़ चढ़कर नारी शक्ति वंदन अधिनियम के पक्ष में वोटिंग की है लोकसभा में स्त्रियों के आरक्षण के पक्ष में 454 बोर्ड के खिलाफ में सिर्फ दो वोट रहे राज्यसभा में तो यह संपूर्ण बहुमत से पास हो गया है।
     हम लोग पूछते हैं कि आखिर मोदी को क्या जरूरत थी स्त्रियों को चुनाव में 33% आरक्षण देने की जबकि कानूनी दिक्कत के कारण 2024 के चुनाव में 33% आरक्षण देना संभव नहीं है मामला सिर्फ साफ है समझ में आता बदलाव मोदी को साफ दिखाई दे रहा है इसमें कोई संदेह नहीं है कि मोद मोदी और और भाजपा महिलाओं के सशक्तिकरण के साथ खुद को जोड़कर राजनीतिक लाभ देना चाहते हैं लेकिन इससे भी जल्दी का दिया है कि चुनावी राजनीति में महिलाओं के आरक्षण को समर्थन दिए बिना मोदी की विरासत एक सब समावेशी और सर्वहित पोशाक प्रधानमंत्री कि नहीं बन सकेगी और वैसे भी शंकर परिवार में मुद्दों के साथ जुड़ जाने व उन पर हग जताने की काव्यगत वर्षों से है 2024 का चुनाव बीजेपी जीते या हारे महिलाओं का आरक्षण के मुद्दे पर मोहर लगाना जरूरी था महिलाओं को आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा ने संसद के विशेष सत्र में नारी शक्ति बंधन विधेयक प्रस्तुत कर एडवांस प्लानिंग की शुरुआत की है सरकार इस कानून के लिए कटिबंध की इसलिए उसकी आखिरी क्षण तक जाहिर नहीं किया ताकि कोई विघ्न संतोषी बिना बजे बोर्ड जाकर अर्चन पैदा ना करें इससे में कोई संदेह नहीं है कि अब नरेंद्र मोदी अपनी हर चुनौती रैली में इसका क्रेडिट लेते रहेंगे। लोकसभा के 2024 2019 और 2034 के चुनाव अगर समय पर हुए तो बीजेपी कांग्रेस और बाकी सभी पार्टियों को अब स्त्री उम्मीदवारों को पार्टी में तालीम देने आगे बढ़ने का मौका देने और देश भर में एक भूमिका तैयार करने का काम शुरू कर देना पड़ेगा आखिर हर लोकसभा चुनाव में 131 सीटों पर स्त्री उम्मीदवारों की आवश्यकता होगी सभी पार्टियों के उम्मीदवारों को इन्हें तो कम से कम 1000 से ज्यादा स्त्रियों को संसद के लिए योजनाओं लड़ने का मौका मिलेगा ।
    कांग्रेस को अच्छी तरफ सोनिया गांधी अपने शासक अल में आरक्षण नहीं देना दे पाई थी क्योंकि पुरु सांसद अंदर से उसका विरोध कर रहे थे और समय पिछले बार की स्त्रियों का आरक्षण का मुद्दा उठाना एक सूची सब्जी लेकिन भारत में कोई परिवर्तन धड़के से नहीं आता है धीरे से आता है तो कल पिछड़े वर्ग की महिलाओं को भी मिलेगा ।
      आप ऐसे में स्त्रियों महिलाओं का कर्तव्य है कि जो भी स्त्रियां सफल स्त्रियां अन्य महिला पैसे भर के लिए स्पेस बनाने की लीडरशिप तैयार करें और महिलाओं के आरक्षण का सम्मान करते हुए कार्य करें महिला पैसे पर उनकी सहभागिता बढ़ाना समानता का ही मामला नहीं वह समग्र विकास और राष्ट्र निर्माण को दिशा में प्रयास भी है नेटवर्क के हर स्तर पर लैंगिक विविधताओं से निर्णय सीता और नमो नमः में बढ़ोतरी होती है ।
    वर्तमान समय में सरकारी योजनाओं महिला केंद्रित हो गई है महिला वोट बैंक पर जम गई है सभी पार्टियों की नजर। राजनीतिक वर्ग द्वारा जो नारी शक्ति का नशा बुलंद किया जा रहा है वह हवा हवाई है और राजनीतिक लाभ के लिए महिला वोटो को लुभाने की साजिश है जबकि श्रम शक्ति में महिलाओं की संख्या उल्टी घटी है । शाबाशी रे लेना राजनीति का हिस्सा है भाजपा का दावा है कि बहुत समय से लंबित और ऐतिहासिक महिला आरक्षण विधि संसद में इसलिए पास हुआ क्योंकि मोदी है तो मुमकिन है मैं सोनिया गांधी रहती है कि बिल हमारा है इसके लिए राजीव गांधी के योगदान को याद दिलाती है जबकि मोदी और सोनिया के बीच ग्रह की और के बीच सच्चाई केवल इतनी है कि स्त्री मतदाता अब निर्णायक हो गई है और इस महिला वोट बैंक पर हर पार्टी का या पार्टी नेता की नज़रें टिकी हुई है ।
गुरुजीसत्यवादी श्रीरामधुन
लेखक-आलोचक-संपादक -काउसंसर

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