मैने ऐसा कभी सोचा भी नही था - "श्रीरामधुन"

मैने कभी ऐसा सोचा भी नही था-
        और वही हो गया,मै देखता रह गया और कुछ भी नही कर पाया जिसका पछतावा जीवन भर
सहना पड़ेगा,होते रहेगा । मै कर भी
क्या सकता था । मेरे हाथ मे उसे रोकने के लिऐ पर्याप्त समय नही था । सब समय समय की बात है कभी कुछ तो कभी  कुछ भी नही आखिर मै करता क्या ? यही सोचकल समय हाथ से रेत की तरह
स्लिप होता रहा और मै कुछ नही कर पाया ।
       काश मै नेता होता,राजनीति मे
होता । काश मै गलत काम कर लेता तो आज ये दिन नही देखना पड़ता । यहां पर भी समय ने साथ नही दिया और रोढ़ा अटका दिया ।
और मै पिछड़ कर रह गया और अच्छे समय के इंतेजार मे पूरा जीवन बीत गया । अभी भी आशा की उम्मीद अभी बाकी है ।
     यदि मै आइएएस, आइपीएस होता तो शायद ये दिन नही देखने पड़ते और मेरे सभी कार्य हो जाते जैसे इनके होते है । चापलूसी करना तो शाथद आ ही जाता कि कैसे कैसे कार्य की चापलूसी समय आने पर करनी पड़ती है वह तो आ ही जाती और मेरा रुका हुआ कार्य हो ही जाता । 
      यदि मै देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होता तो शायद ऐसे सोचने की नोबत ही नही आती है ये पूरा का पूरा कार्य हो जाता है और ये दिन किसी को नही देखने पड़ते । सारा जहां खुशहाल जीवन बिता रहा होता । ये सभी गलती मेरी ऐसी सोच की ही है बल्कि सभी लोगो की है यह भी सोचने की जरूरत नही होती ?
     काश मै एक अध्यामिक अधवा वैज्ञानिक व्यक्ति होता तो ऐसी स्थिति कभी भी निर्मित ही नही होने देता जादूई छड़ी से ऐसा फार्मूला बनाता कि सब काम एक ही झटके से पूरे हो जाते कि  आज ऐसे प्रशन्न ही नही उठते ।
      यदि मै एक सफल डाँक्टर होता तो किसी को मरने भी नही देता यह तो बड़ी दूर है इतनी जनसंख्या भी नही बढ़ने देता । जीवन मृत्यू का फासला कर्मो पर अधारित कर फेसला सुनाता । यह सुनने और पढ़ने मे अजीब जरूर लगता है किन्तु नामुमकिन नही है ।
 ...   काश मै किसान होता तो अन्न
के साथ ऐसे बीज बोता जो सभी को इंसानियत के पाठ पठ़ानै की जरूरत ही पढती और सभी खुशहाल होते और किसी के बहकावे मे आकर अपना जमीर बेचने की जरूरत नही होती ।
    अगर मै सरकारी नोकर होता तो
अपना कार्य ईमानदारी से करता तो कम से कम इस भ्रष्टाचार को रोकने
की भरसक करता और किया भी ,उसी का नतीजा भुगत भी रहा हूं
किन्तु अकेला पड़ गया और अपनै ही वालो नै धोखा दिया । अब यह धोखा मैने दिया कि लोगो नै दिया यह मुद्दा नही है मुद्दा यह है कि मै ही
कुछ नही कर पाया । गलती दूसरो पर धोपनै से काम नही चलेगा गलती तो हुई हे । गलती की जिम्मेदारी मेरी ही है कि मै देश को सही दिशा नही दिखा पाया । 
       भ्रष्टचार, व्यभिचार ,मंहगाई, बेरोजगारी, आबादी जनसंख्या को नही रोक पाया । रिस्तौ को तार तार
होने सै नही बचा पाया । ये तमाम लोग मनमानी करते रहे ,मै नही रोक पाया । इसका अफसोस सदैव रहेगा जब तक मै जिंदा हूं तब तक होते रहेगा । 
     सबसे बड़ी बात तो यह है कि मै जिंदा ही क्यू हूं । इस बदलाव के युग मे । यह वदलाव का युग मनुष्य का बनाया हुआ है कृतिम है अतः इसका अभी भी समय रहते सुधार
नही किया गया तो इसका अंजाम खतरनाक हो सकता है और दुनिया जहां से शुरू हुई थी वही पर पहुचने
वाली है । एक आदमी और एक औरत से दुनिया बनीऔर आगे बढ़ते हुऐ आज चरम सीमा पर पहुंच चुकी है । क्या हम भी एक आदमी और एक औरत मे तबदील होने वाले है । आदमियों के हाथ से अब तो आने वाले समय सत्ता जाने ही वाली है और औरतो का राज आने वाला है । यानि औरतो के काम मर्द और मर्द का काम औरते करने वाले है । औरतो के बारे यह कहा गया है कि "जिस भगवान उसे बनाया है वह उसे समझ नही पाया है ।" अब ऐसे मे विनाश होने मे देव्य शक्तियां भी कुछ नही कर पाऐगी । ऐसा वदलाव हमे नही चाहिए । इस बदलाव को कौन रोक
सकता है ? इसे हम ही रोक सकतै है । सकारात्मक सोच के साथ कार्य
करने और नियमो के अधीन इसे रोका जा सकता है । इसे रोकने वाले लोगो की संख्या लगभग दस हजार के आसपास है । ऐसे लोग यदि ठान लेते तो कर सकतै है लेकिन वे है कहां ? ये कोई नही जानता ! जब समय आऐगा तो स्वतः प्रकट हो जाऐगें ।
गुरुजीसत्यवादी श्रीरामधुन
लेखक-आलोचक- संपादक-काउंसलर ।

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