दुश्मन भी अच्छे दोस्त बन सकते है !

दुश्मन भी अच्छे दोस्त बन सकते है ! -बशर्ते कि आप लगातार प्रयास करते रहे -
   वर्तमान समयमे प्रायः प्राय: यह देखने को मिल रहा हे कि छोटी सी बात को लेकर दोस्ती दुशमनी मे बदल जाती है और वह बढ़ते बढ़ते
सभी सीमाएं पार कर जाती है और दोनी मे बिना वजय के जाँनी दुश्मन हो जाते है । जबकि बात छोटी सी थी ,गलतफहमी भी हो सकती है । ऐसे मे जो मनमुटाव होता है उसे समाप्त किया जा सकता था अतः ऐसे मामलो मे लगातार प्रयास कर दुशमनी को दोस्ती मे बदला जा सकता है ।
क्या सच में दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है जरूरी नहीं दुश्मन का दुश्मन दोस्त हो कभी-कभी एक दुश्मन दूसरे दुश्मन की मदद अपने फायदे के लिए लेता है और जब फायदा निकल जाता है तो दोस्ती किसी काम की नहीं रहती ।
    दोस्त से अच्छा दुश्मन होता है जिसका पता होता है कि दुश्मन है कि लेकिन दोस्त जब दुश्मन बनता है तो कुछ नहीं बचता क्या यही सही बात है जिंदगी में सबसे गंदी और गहरी चोट वही देते हैं जो हमारे करीबी और सबसे अधिक ईमानदार नजर आते हैं दोस्तों को हमारी कमजोरी हमारे राज सब पता होती है अवसर आने पर वह उनको हथियार बना लेते हैं और हम कुछ नहीं कर पाए क्योंकि वह सब जानते हैं ।
    अगर दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है तो फिर दोस्त का दोस्त दुश्मन क्यों नहीं होता -
" यह एक राजनीतिक और रणनीतिक कहावत है जो शत्रु को परास्त करने के लिए असर के रूप में प्रयोग किया जाता है क्योंकि किसी शत्रु को पराजित करने के लिए यदि दो शत्रु मिल जाएं तो अवश्य किसी को बहुत ही सरलता से प्राप्त किया जा सकता है इसलिए यह प्राचीन कला प्राचीन काल में से ही चली आ रही है किसी भी शत्रु को परास्त करने के लिए उसके शत्रु को दोस्त बनाया जाता था यहां पर शत्रुता का भाव सर्वोपरि है इसलिए यहां पर जो भी दुश्मन का दुश्मन दोस्त है वक्त पढ़ने पर वह भी अपना स्वरूप बदल लेगा क्योंकि इनकी मित्रता है किस आधार पर हुई है कि इन्हें अपने शत्रु को परास्त करने करना है या ना कि इस भाव से हुई है इनमें मित्रता का कोई भाव जन्म लिया था इसलिए यह मित्र स्वयं के साथ को सिद्ध करने के लिए है।
दोस्त का दोस्त दुश्मन इसलिए नहीं होता क्योंकि यहां पर शत्रुता का भाव नहीं बल्कि मित्रता का भाव है जहां पर मित्रता का भाव होता है स्वयं की किसी भी स्वर्ण सिद्धि के लिए दोस्ती नहीं होती तो वहां पर दुश्मनी की संभावना बिल्कुल भी नहीं होती क्योंकि जीवन में दोस्त भले ही चाहे जितने बन जाए पर सही मायने में जीवन में एक या दो दोस्त ही सही मायने में दोस्त होते हैं चाहे वह उसका दोस्त हो या स्वयं का दोस्त है उसने हितेषी का भाव छुपा होता है इसलिए उन्हें कभी भी कड़वाहट या शत्रुता का भाव नहीं होता वह दुश्मन भी नहीं हो सकता
      दोस्ती और दुश्मनी अलग-अलग प्रकार की होती है 
एक दुश्मन कभी-कभी दोस्त से भी दिखता है क्योंकि वह सामने से वार करता है पीछे से वार करंने दोस्त से अच्छा होता है । ऐसे दोस्तो से अच्छा तो हमारा दुशमन होता है ।
आज ही के समाचार पत्र मे पढ़ा है बीबी ने अपने प्रेमी से मिलकर हत्या कर दी । प्रेमी ने अपने भतीजो को 50 हजार रु० देकर हत्या करवा दी । इस रिस्तो को क्या नाम देगे । इस बदलते युग मे आप अकेले हो और चारो तरफ दुशमनो से घिरे हो । आपको सिर्फ अपने पर  ही भरोसा करना होगा ।
माँ-बाप,भाई-बहन, भाई-भाई पति-पत्नी सब के सब एक दूसरे के दुशमन है तो दोस्ती की उम्मीद किससे की जाये । इन सबके पीछे एक ही वजय है और वह यह है कि-
जर,जोरू और जमीन है ।
और यदि ये वजय नही है तो दोस्त ही दोस्त के काम आता है अतः दोस्ती कभी ना टूटे इस बात का ध्यान रखना चाहिए । दोस्ती अपने ही तक सीमित रखना चाहिए घर के बाहर की ही दोस्ती रखना चाहिए । घर के अंदर की दोस्ती तो सबसे ज्यादा खतरनाक होती है ।
दोस्ती आदमी औरत मे नही होती है उनमे आकर्षण होता है दोस्ती को दुशमनी मे बदलना हो तो घर मे उसे प्रवेश करा लो फिर देखो वही हाल होगा जो आज के समाचार मे छपा है ।इस तरह की घटनाएं कुछ ज्यादा ही हो रही है जिसमे दो -तीन
बातो की ओर इसारा करती है -
 1*औरत पर पति की ज्यादती
2* औरत का चरित्र
3*सेक्स भी वजय हो सकती है ।
     दोस्ती और दुशमनी के बीच मे अनेको कारण हो सकते है । इसमे से कोई कारण गंभीर होते है तो कुछ कारण अतिगंभीर होते है ।                
कुछ तो कोई वजय ही नही 
  होती है ऐसे मे वजय अथवा गलतफहमी को दूर कर दुशमनी को फिर से दोस्ती मै बदल लेना चाहिए। इसके लिऐ दोनो को प्रयास करते रहना चाहिए । कुछ ऐसी बाते भी हो जाती है उसे भी माफ कर दोस्ती बनाए रखना चाहिए । किसी चीज की तह मे जाओगे तो सच्चाई
सामने आ ही जाऐगी । जो भी हो दोस्ती अपनी जगह है । दोस्ती कम लोगो से ही होती है । पूरे जीवनकाल मे 3 या 4 ही लोग दोस्त होते है । अंत मे ये ही 4 लोगो
के कंधो पर अलविदा भी होना होता है ।
गुरुजीसत्यवादी श्रीरामधुन
लेखक-आलोचक-काउंसलर

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