कटुवचन से आहत् लोग मांग रहे न्याय

"कटुवचन,अपशब्द बोलने वाले नेताओं और अधिकारियों पर सख्त कार्यवाही हो ऐसा चाहती है आम-जनता " 
     हमारे भारत देश मे अपशब्दों को लेकर रोजाना लोग मर कट रहे है,लड़ाई झगड़ा ,खून-खराबा हो रहा है । कोई भी व्यक्ति किसी के भी बारे मे कुछ भी बोल रहा है ,कह रहा है , लिखकर रहा है । इनमे ज्यादातर लोग नेता व सरकारी अफसर होते है आखिरकार सरकार इन पर शिकंजा क्यो नही कसती है,इनके प्रति सजा का प्रावधान क्यो नही है ? 
    ये नेता लोग पहले तो बयान बाजी करते हैं और बाद में माफी मांग कर किनारा कर लेते हैं। बयान बाजी करते वक्त भाषा का शिष्टाचार की तमाम सीमाएं लांग दो और बवाल उठे तो, ऐसे बयानों से या तो किनारा कर लो या फिर माफी मांग कर ठंडा बस्ते मे डालने की कोशिश करने लगो । मौका चुनाव का हो तो नेताओं में ही है प्रवृति ज्यादा ही नजर आने लगती है । लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार का दौर शुरू होने के साथ ही साथ बिगड़े बोल बता रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट तक की ओर से सरकार को दी गई नसीहत के बावजूद नेताओं की एक दूसरे को नीचा दिखाने और अपमानित करने की जरूरत पड़ती दुष्प्रवृत्ति कम होने का नाम नहीं ले रही है
 ताजा प्रकरण में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार कंगना राणावत से जुड़े हैं, जहां दोनों ही नेत्रियों को लेकर आम मर्यादित टिप्पणी प्रतिद्वंती दलों के नेताओं की तरफ से की गई है । बयान बाजी कहानी लिखित तो कहीं मौखिक रूप से की गई है और उसके बाद सफाई पेश करने का काम भी खूब निभाया है । लेकिन क्या सफाई देने से ऐसे बयानों को लेकर माफी दी जाना चाहिए ? क्या सार्वजनिक जीवन में रहने वालों को वाणी पर संयम नहीं रखना चाहिए ?  यह सवाल इसलिए की क्योंकि वर्षो से यही बात सुनते आए हैं कि जब तीर कमान से और बात जुबान से एक बार निकल जाए तो फिर वापस नहीं होती । कोई लाख सफाई देने वालों पर लिखी और कही गई बातों से जो जख्म लगते हैं उन्हें आसानी से भरा नहीं जा सकता ।
अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह कतई नहीं समझा  जाना चाहिए कि वर्ग समुदाय में संघर्ष पैदा करने वाले और दूसरों के मान सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले बयान स्वीकार किया जाए तभी तो सुप्रीम कोर्ट पहले ही केंद्र व राज्य सरकारों को कह चुका है कि वह जहरीले बोलकर मामलों में  स्वप्रेरणा से संज्ञान लेकर कार्रवाई करें । लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों की अवहेलना होते ,दिखने लगे तो ऐसा लगता है कि राजनेताओं को ना तो अदालत की परवाह है और ना ही कानून का डर। लेकिन हमारे यहां तो ऐसी स्पीच देने यानी कि नफरत थी भाषणों की परिभाषा तक तय नहीं हो पा रही है ,ऐसे में संबंधित कानून में सख्त प्रावधान की आवश्यकता है ।
गुरूजीसत्यवादी श्रीरामधुन
लेखक-आलोचक-व० सम्पादक 

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