दुख अथवा शोक के दो सेतु ..... !
दुख अथवा शोक दो ही हेतु होते हैं- प्रिय वियोग एवं आप्रियसंयोग अथवा ईस्ट का विनाश एवं अनिष्ट की प्राप्ति ।इन्ही दो बातो को लेकर सारा संंसार दुखी हो रहा है । हिंदू शेरों से मनुष्य को दुख सुख चिंता भय अथवा व्याकुलता होती है इन्हीं दो बातों को लेकर सारा संसार दुखी हो रहा है ।ऐसा कहा जाए तो भी अतिश्योक्ति ना होगी। कोई कोई तो इस कारण इतने अधिक दुखी हो जाते हैं कि उन्हें सारा संसार अंधकार में दिखने लगता है । उन्हें चारों ओर से निराशा के बादल घेर लेते हैं। शोक के मारे दिन रात उनकी छाती जला करती है, दिन में चैन नहीं पड़ता और रात को नींद नहीं आती, शरीर सूखकर कांटा हो जाता है, खाना पीना हराम हो जाता है - यहां तक कि कुछ लोगों को तो जीवन भारी हो जाता है और वह भी घुलकर शरीर छोड़ देते हैं कुछ लोग तो और भी आगे बढ़ जाते हैं । वह मूर्खता है विष आदि का प्रयोग करके, जल में डूब कर फांसी लगाकर अथवा आग में जलकर प्राण त्याग देते हैं।: लोग स्त्री, पुत्र, धन, मान 'कीर्ती थी अथवा स्वास्थ्य आदि इष्ट पदार्थों के नाश हो जाने अथवा किसी मुकदमे में फंस जाने के, किसी...